Helpline: +91 6291014088

30% छूट सभी पाठ्यक्रमों पर - कोड प्रयोग करेंKAABHARAT2024

का-भारत से क्यों जुड़ें?

भारत के ऊपर पहले मुगलों ने आक्रमण किया और बहुत नुकसान हुआ। जब हम इस आक्रमण से उभरने लगे थे, तभी अंग्रेजों ने आक्रमण किया और 1947 के बाद हमें तथाकथित स्वतंत्रता प्राप्त हुई। अब हम यहाँ इस स्वतंत्रता को तथाकथित क्यों कह रहे हैं? क्योंकि जब कोई बाहरी सत्ता हमारे ऊपर आक्रमण करती है, तब वह प्रथम मनुष्यों का संहार तो करती ही है, लेकिन यह संहार हमें पूरी तरह से मिटा नहीं सकता। हम इस संहार से उभरने का कोई न कोई रास्ता ढूंढ ही लेते हैं। क्योंकि उस परकीय सत्ता का अस्तित्व हमें मान्य नहीं होता। इसका कारण हैं हमारी और उनकी संस्कृति में होने वाले सांस्कृतिक और धार्मिक भेद। जब तक यह भेद नहीं मिटता, तब तक एक पराधीन राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सत्ता मान्य नहीं कर सकता। इस विषय में आचार्य चाणक्य कहते हैं:

शस्त्रैर्हतास्तु रिपवो न हता भवन्ति 

 प्रज्ञाहतास्तु नितरां सुहता भवन्ति। 

शस्त्रं निहन्ति पुरुषस्य शरीरमेकं प्रज्ञा कुलं च विभवं च यशश्च हन्ति।। 

किसी शत्रु के ऊपर शस्त्र का प्रहार करने से वह पूरी तरह से नष्ट नहीं होता। क्योंकि

शरीर के घाव समय और दवाई के साथ ठीक हो जाते हैं। लेकिन जिस शत्रु की प्रज्ञा नष्ट की जाए, वह जड़ से नष्ट हो जाता है और उसका नामोनिशान नहीं रहता। क्योंकि शस्त्र का प्रहार करने से केवल शरीर नष्ट होता है। लेकिन बुद्धि या प्रज्ञा नष्ट करने से पूरे ऐश्वर्य, कुल और कीर्ति का नाश होता है। इस वजह से अगर शत्रु को नष्ट करना हो, तो शरीर के साथ उसकी बुद्धि का भी खात्मा करना जरूरी है।

अब हम समझ सकते हैं कि भारत के लिए मुगलों से भी ज्यादा घातक अंग्रेज थे। क्योंकि मुगलों की सत्ता में हम भारतीय अपनी ही संस्कृति के खिलाफ खड़े नहीं हुए। लेकिन अंग्रेजों के रहते और आज भी हम देख रहे हैं कि खुद भारतीय ही अपनी संस्कृति से घृणा करने लगे हैं। अगर भारत से भारतीयत्व निकाल दिया जाए, तो एक भारतीय और अंग्रेज में एक ही भेद होगा, त्वचा का रंग।

इस भारतीयत्व को कैसे बचाया जाए? क्या हम अंग्रेज़ों की भाषा में बात करके, उनके जैसे कपड़े पहनकर, कर, उनके जैसी उच्छृंखल जीवनशैली अपनाकर भारतीयत्व बचा सकते हैं? नहीं। यह छोड़िए, आज हमें भारतीयत्व का अर्थ ही पता नहीं। तो हम पहले जानेंगे इस शब्द का अर्थ।

भारतीयत्व का अर्थ है भारतीय होने का अभिमान और ‘भारतीय’ यह शब्द आता है भारत इस शब्द से। भारत शब्द की उत्पत्ति होती है ‘भा’ धातु से। ‘भा’ शब्द प्रकाश को संबोधित करता है और इस प्रकाश को हम कहते हैं ज्ञान। क्योंकि ज्ञान ही अज्ञानरूपी अंधेरे का निर्मूलन करके

जीवन को प्रकाशित करता है। तो भारतीयत्व का अर्थ है, ऐसी जीवनशैली जहां जीवन का लक्ष्य है ज्ञान की प्राप्ति।

लेकिन आज कितने भारतीय ज्ञान की प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य मान उसे प्राप्त करने हेतु मेहनत कर रहे हैं? कुछ ही। आज तो परिस्थिति यह है कि ज्ञान की बात करें तो लोग हमें पिछड़ा और बेरोजगार समझने लगते हैं। यह परिस्थिति उत्पन्न होने का कारण है अंग्रेजों का भारतीय शिक्षा प्रणाली में हस्तक्षेप।

आज भारत देश के लोगों को लगता है कि केवल अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा लेने से ही एक अच्छा करियर बन सकता है, जिससे वह सुखी जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इसकी वजह से हम स्थानीय भाषाओं से दूर जा रहे हैं और बहुत सारी ऐसी भाषाएं विलुप्त भी हो चुकी हैं। इसकी वजह से उन भाषाओं में समाया दिव्य ज्ञान भी हमसे दूर जा रहा है, जिसकी वजह से हम भारतीयत्व से दूर होते जा रहे हैं। कुछ दशकों के बाद हम भारतीय हैं, इसका एहसास भी हमारे पोतों और परपोतों को नहीं होगा।

का-भारत यह एक पहल है जिसकी उत्पत्ति इस प्रलयकारी परिस्थिति को देखकर हुई। यहाँ हिंदी, मराठी, बंगाली, तमिल जैसे भारतीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जाता है। हमारा ध्येय है हमारी भावी पीढ़ी को भारतीय भाषाओं और उनकी मातृभाषाओं से अवगत करना, जिससे वह विदेशी भाषा और संस्कृति के गुलाम न होकर अपनी अपने भाषा और संस्कृति के उत्तराधिकारी बनें। क्योंकि भारत की संस्कृति और ज्ञान इन भाषाओं में ही समाया हुआ है।

भारतीय भाषाओं का महत्व केवल पारमार्थिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी है। रूस में विद्यार्थी केवल रूसी भाषा में शिक्षण प्राप्त करते हैं। डेनमार्क में विद्यार्थी डेनिश भाषा में सीखते हैं। फ़िनलैंड जैसे तथाकथित दुनिया के सबसे सुखी देश में शिक्षण अंग्रेज़ी में नहीं बल्कि फिनिश भाषा में होता है। क्या अपनी मातृभाषा को अंग्रेज़ी से ऊपर रखकर इन देशों ने गलत किया? अगर इस विदेशी भाषा का इस्तेमाल करना ही करियर बनाने का एकमात्र तरीका है तो ये देश प्रगतिशील देशों की श्रेणी में क्यों आते हैं? हमें बताया गया है कि अंग्रेज़ी में डिग्री लेने से ज्यादा ज्ञान प्राप्त होता है। लेकिन सच तो यह है कि मातृभाषा में शिक्षण लेने से विषय का सबसे गहरा ज्ञान प्राप्त होता है। क्योंकि जिस भाषा में हम सोचते हैं, बातें करते हैं, व्यवहार करते हैं, उस भाषा में अध्ययन करना सरल और सुगम होता है।

आजकल बहुतांश बच्चे स्कूल जा तो रहे हैं, लेकिन कुछ सीख नहीं पा रहे। जो सीख पा रहे हैं, उनका सीखना भी बहुत कमजोर हो चुका है। यह सीखना इतना प्रभावशाली नहीं है कि जागतिक बाजार में वे अन्य विदेशियों से मुकाबला कर नौकरी हासिल कर सकें। यह सब विद्यार्थियों के ऊपर भरकम पाठ्यक्रम लादने के बावजूद हो रहा है और यह चिंतनीय स्थिति एक विशिष्ट भाषा के संदर्भ में दिख रही है। वह भाषा है अंग्रेज़ी, जिसका इस्तेमाल भारतीय शिक्षण पद्धति में हो रहा है, जब भारत का इस भाषा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। अगर इस स्थिति का चिंतन अभी नहीं किया गया तो भारतीय युवा वर्ग का भविष्य अंधेरे में ही रहेगा।

भारत सरकार ने इस स्थिति को ध्यान में रखकर एक नई शिक्षण नीति अपनाने का फैसला किया है, जहाँ भारतीय भाषाओं में डिग्री उपलब्ध कराई जाएगी। इस संदर्भ में अंग्रेज़ी

में उपलब्ध पुस्तकों का अनुवाद भारतीय भाषाओं में बड़े उत्साह से हो रहा है। जल्द ही हमें अपनी मातृभाषा में शिक्षण प्राप्त करने का ‘अधिकार’ प्राप्त होगा।

इस स्थिति का आकलन करते हुए का-भारत यह हमारी नई पहल है।
हमारा आपसे निवेदन है कि इस प्रस्ताव से अवश्य जुड़ें।

शिशिर काटोटे

C:\Users\katote\AppData\Local\Microsoft\Windows\INetCache\Content.Word\Brown Modern Effective Time to Study YouTube Thumbnail.png

Tags:
Share:

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *